आत्ममंथन

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लोकपाल और जनलोकपाल में जुर्माने व हर्जाने का प्रावधान करना क्या उचित हैं ?

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क्या जनलोकपाल और लोकपाल जैसे कानून लागु होने के बाद हमारे देश भर्ष्टाचार मुक्त हो जायेंगे ? शायद नहीं, क्यूंकि जिस तरह का उम्मीद देश के जनता ने जनलोकपाल और लोकपाल संजोये वह उम्मीद आसानी से पूरी होती नहीं दिख रही हैं। राजनीती पार्टी सस्ती लोकप्रियता के खातिर तो इस तरह के कानून की कबायद करते दीखते है व इसके पक्ष में हामी भरते हैं जबकि समूचे देश के सामान्य नागरिक सच से वाक़िफ़ हैं कि भ्रष्टचार के लिए किसी को जननी और जनक का संज्ञा दी जाती हैं हमारे देश के नेता ही हैं जिनके ही सरक्षण में भ्रष्टचार की बीमारी फैलती हैं और आला अधिकारी से होकर निम्न श्रेणी के अधिकारी तक पहुँचती हैं अर्थात भ्रष्टचार के माध्यम से इकट्ठा की गई मोटी रकम (रिस्वत) का ज्यादातर हिस्सा नेताओ को पार्टी फण्ड के रूप में अथवा भेंट के रूप में दी जाती हैं। जबकि हाल में जितने भी बड़े घोटाले हुए उसमें देश के बड़े -बड़े नेताओ का नाम उजागर हुए। जिस देश में नेता जो खुदको ही भ्रष्टाचार में लिप्त हैं, क्या वह इस तरह के कानून को मंजूरी दे सकते हैं जो उनके खिलाफ ब्रह्मस्त्र का काम करेंगे और जनता को भ्रष्टचार सड़े निज़ात दिलाने में मददगार साबित होंगे? जी हँ, ऐसा मुमकिन हैं क्यूंकि नेताओ को भलीभांति ज्ञात हैं कि कानून कितना भी शख्त क्यूँ न हो पर लागु जितने शख्ती की जायेगी उतने ही शख्त रूप अख्तियार करेंगे और लागु करने का जिम्मा तो नेताओ और उनके इर्द गिर्द बेठे आलाधिकारी का ही जो उनके इशारे का मुहताज़ हैं। फिर भी राजनीतीक नेता को कानून का पारूप तैयारकरना होता हैं वेसे में कानून के मसौदा तैयार करने में अपनी हित का पूरा ख्याल रखते हैं जो उनके लिए भविष्य में संजीवनी का काम करेंगे।

एक तरफ जनता अब इस तरह के व्यवस्था व तरीका से उब चुकी हैं वही नेता कितना भी प्रयन्त कर ले वे अपनी आदत से बाज नहीं आ सकते हैं। इसीका नतीजा हैं कि जब कोई बिल जिसमें जनता के सरोकार से जुड़ा हो उसमें इस तरह का क्लॉज़ (कंडीशन) जोड़ दिए जाते हैं ताकि बिल कितना भी शशक्त क्यूँ न हो पर जनता उस क्लॉज़ के कारण किसी अधिकारी अथवा नेता के खिलाफ शिकायत करने की हिम्मत नहीं कर सकती है।

चाहे दिल्ली सरकार का जन लोक पाल बिल हो या केंद्र सरकार का लोकपाल बिल। हालाँकि असमानता गणना करना अभी शायद सरल नही होगा पर इन दोनों बिलो के बीच पर यदि समानता की बात करेंगे तो इन दोनों में एक विन्दु जरुर देखने को मिलेगा कि अगर शिकायत गलत साबित होगी तो जनलोकपाल के कानून के अंतरगर्त से ५ लाख तक जुर्माना का प्रावधान किया गया जबकि लोकपाल के कानून के अंतरगर्त २५ हज़ार का प्रावधान किया गया। अब सवाल ये उठता है कि जिस देश में २६-३२ के रोज खर्च करने वाले आदमियों को गरीबी रेखा के ऊपर समझे जाते हैं उस देश में जुर्माना २५ हजार से ५ लाख तक तर्कसंगत कैसे मान लिया जाय जबकि वास्तविक में आधी आबादी गरीबी में जीवन यापन करने के लिए बाध्य हैं। एक तरफ नेता और अधिकारी का रुसूख के सामने कितनी भी प्रभावशाली बिल का मसौदा तैयार किया गया व कानून के रूप में मान्यता दे दिया गया पर कभी भी कारगर साबित नहीं हुआ मसलन अभीतक न ऐसा कोई नेता मिला और न ही ऐसा अधिकारी मिलें जिसे भ्रष्टाचार में संलिप्ता के कारण कोई बड़ी सजा भुगतें हो। जबकि न्याय पालिका ने कई बार खुदको सज्ञान लेकर ऐसे नेता और अधिकारी के खिलाफ मुकदमा दायर करने की अनुमति दिए है और उसके जाँच के लिए कई बार स्पेशल इंवेस्टगेशन टीम का भी गठन किये गए पर अभीतक नाकामयाबी ही देखनो को मिली।

दरशल में लोकपाल हो जन लोकपाल जब तक जनता को पूर्णतः शिकायत करने की छूत नहीं दी जाती तब तक जनता किसी भी नेता अथवा अधिकारी के खिलाफ शिकायत करने हिम्मत नहीं जुटा पायेगी यद्दिप जनता इन नेताओ और अधिकारी के खिलाफ प्रयाप्त सबूत होने के वाबजूद यह डर हमेशा बना रहेगा की दोषी नेता या अधिकारी अपने प्रभुत्व के बल पर इसे बड़ी आसानी से जूठा साबित कर ही देंगे जो कि अब तक होता आया हैं, तत्पश्चात एक तो लोकपाल को हर्जाने के तोर पर मोटी रकम चुकानी होगी जबकि नेता और अधिकारी की रोजमर्रा कि हरकतें से रुबरु होना पड़ेगा जिसके लिए कोई जनता कतई तैयार खुदको नहीं कर पाएंगे। परिणामस्वरूप वही होगा जो इन दिनों RTI कार्यकर्ता साथ हो रहे हैं अनंतः ने कितने को अपनी जान से भी हाथ धोने पड़े है, वजह व्यवस्था में खोट होना।

केंद्र सरकार हो अथवा राज्य सरकार वोट के लिए तो लोकपाल और जन लोकपाल जैसी कानून तो लाती हैं ताकि सस्ती लोकप्रियता हासिल की जाय लेकिन उसके साथ इस तरह का क्लॉज़ और नियम को बड़ी चतुराई से जोड़ दिए जाते हैं जिस कारण उनके खिलाफ लाख कोशिश के उपरांत शिकायत न कर सके। वही जब नेता हित को लेकर कोई कानून बनाती है तो अतयन्त प्रयन्त के वाबजूद शायद जनता को कोई भी मौका नहीं दिया जाता है ताकि लोक उसके खामिया पर सवाल उठा सके। वास्तविक में सरकार हमारे हाथ में लोकपाल और जनलोक पाल के माध्यम से तो जनता के हाथ में बम रख दिए हैं और हमें भर्ष्टाचारियों के खिलाफ इस्तेमाल की आज़ादी तो दे दिए गए हैं पर डर हमेशा रहेंगे की पुरे सबूत व सावधानी रखने पर भी तय नहीं किया जा सकता हैं कि भर्ष्टाचार में लिप्त नेता और अधिकारी को सजा मिलेंगे अथवा नहीं जब तक इसका सौ फीसदी परिणाम अनुकूल नहीं होता अर्थात जनता को ही अपनी सूझ- बुझ से लोकपाल व जनलोकपाल जैसे कानून का उपयोग करनी होगी और सदेव खुदको बचना होगा उसी भांति जैसे कि कभी -कभी बम से दुश्मन व प्रतिद्वंदी को आघात पहुचने के एवज़ में खुद ही झुलस जाते हैं।

आखिरकार सरकार को चाहिए कि जितना शशक्त कानून बनायीं जाय उतनी सरलता के साथ लोक लाभविंत हो सके इसके लिए जुर्माने और हर्जाने जैसे एंटीक्लॉज को हटाया जाना चाहिए अथवा कानून में जाँच का माप दंड और मान दंड को सरलबनाये जाना चाहिए ताकि ये जनलोकपाल और लोकपाल के अधिकारी पूर्णतः जवाबदेही बने कि सभी तरह के सबूत को खंगाले और एकत्रत करे।



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